Act 2013 – नया कंपनी विधेयक संसद में पारित।

8augनई दिल्ली। संसद ने गुरुवार को नए कंपनी विधेयक को पारित कर दिया। यह विधेयक करीब छह दशक पुराने कंपनी अधिनियम 1956 का स्थान लेगा। नए कानून के अमल में आने से कंपनियों के कामकाज के तौर तरीकों और नियमन में व्यापक बदलाव आएंगे। राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होने के बाद विधेयक कानून का रूप ले लेगा। इसमें कंपनियों के लिए सामाजिक कल्याण के क्षेत्र में खर्च को अनिवार्य किया गया है। कंपनी प्रवर्तकों के किसी धोखाधड़ी में लिप्त होने के खिलाफ निवेशकों को अधिकार दिए गए हैं और कंपनियों को
महिला निदेशकों की नियुक्ति के लिये प्रोत्साहित किया गया है। नए विधेयक में कंपनियों के संचालन में उच्च पारदर्शिता पर भी जोर दिया गया है। कंपनियों मेंकार्यकारियों के वेतन और लेखापरीक्षकों के कामकाज के मामले में पारदर्शिता पर जोर दिया गया है। कारपोरेट कार्य मंत्री सचिव पायलट ने कंपनी विधेयक के संसद में पारित होने को ‘ऐतिहासिक कदम’ बताया। उन्होंने कहा कि इसके अमल में आने से कंपनियों के क्षेत्र में ‘कम से कम नियमन और अधिक अनुपालन’ का परिवेश बनेगा और देश वृद्धि के रास्ते पर तेजी से आगे बढ़ेगा।
नया कंपनी विधेयक पूरी तरह से नए सिरे से तैयार किया गया है और यह मौजूदा कंपनी अधिनियम 1956 का स्थान लेगा। पिछले 57 साल में इसमें 25 संशोधन किए जा चुके हैं। इसके कई प्रावधान और नियम पुराने पड़ चुके हैं और वे अपर्याप्त हैं।
कंपनी विधेयक के पारित होने का उद्योग संगठनों, राजनीतिक वर्ग और सलाहकार सहित सभी संबद्ध पक्षों ने स्वागत किया है। नया विधेयक 300 पृष्ठों का है और इसमें 30 भाग हैं। पायलट ने राज्यसभा में विधेयक पर हुई चर्चा का जवाब देते हुए कहा कि इस विधेयक के जरिये सरकार का मकसद देश में कंपनी प्रशासन में सुधार लाना, निवेशकों के हितों की रक्षा तथा आर्थिक विकास की गति को बल प्रदान करना है।
उन्होंने कहा कि उस समय की तुलना में अब स्थिति काफी बदल गयी है और भारत में कंपनियों की संख्या 10 लाख से अधिक हो गई है। इसके साथ की बदलते दौर में कई नई चुनौतियां भी सामने आई हैं। उन्होंने कहा कि एक ओर भारतीय कंपनियां विदेश जा रही हैं, वहीं विदेशी कंपनियां भारत आ रही हैं। इस विधेयक में इसका भी खयाल रखा गया है।
इस विधेयक को लोकसभा ने सात महीने पहले ही पारित कर दिया था। उसके बाद संसद के कामकाज को बाधित किये जाने की वजह से यह राज्यसभा में पारित नहीं हो सका था। संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति ने तीन साल पहले ही इस विधेयक पर अपनी पहली रिपोर्ट सौंप दी थी।
पायलट ने कहा कि संसदीय समिति की 96 प्रतिशत सिफारिशों को विधेयक में शामिल कर लिया गया है और इसे अमल में लाने को अंतिम नियम तैयार करते समय मंत्रालय विभिन्न पक्षों से प्राप्त सुझावों को भी इसमें शामिल करने का प्रयास करेगा।
नए कानून में कंपनियों के लिए बोर्ड में एक तिहाई स्वतंत्र निदेशक बनाया जाना अनिवार्य किया गया है। साथ ही बोर्ड में कम से कम एक महिला निदेशक को भी नियुक्त किए जाने की अनिवार्यता रखी गई। उन्होंने कहा कि कंपनियों को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा कि दलित, गरीब सहित हर वर्ग की महिलाओं को बोर्ड में प्रतिनिधित्व मिले।
उन्होंने कहा कि कंपनियां को बंद करने के प्रावधानों को भी सरल बनाया गया है। इसके साथ ही विधेयक में धोखाधड़ी को भी परिभाषित किया गया है। उन्होंने कहा कि सरकार का जोर इस बात पर है गड़बडी होने के पहले ही उसे पकड़ा जाए, न कि गडबड़ी हो जाने के बाद कार्रवाई की जाए।
विधेयक में पारदर्शी कारपोरेट गवर्नेंस तथा गड़बड़ियों को दूर करने के मकसद से विभिन्न मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए विशेष अदालतें गठित किए जाने का भी प्रावधान किया गया है। नए कानून में कंपनियों को सामाजिक दायित्व (सीएसआर) उसी तरह निभाना होगा, जिस तरह उनका कर दायत्वि होता है।
विधेयक में ऐसा प्रावधान है कि कंपनियों को हर पांच साल में अपने ऑडीटर बदलने होंगे ताकि प्रबंधन के टकराव नहीं हो कामकाज की निष्पक्ष तरीके से जांच हो सके।
विधेयक पर हुई चर्चा में भाग लेते हुए कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने कहा कि इस विधेयक के जरिये मूल कंपनी कानून में करीब 60 साल बाद बदलाव होगा। इस बीच देश के निगमित जगत में काफी बदलाव आए हैं, उसका आकार काफी बढ़ गया है तथा उनकी जरूरतें भी बदली हैं।
भाजपा के वीपी सिंह बदनोर ने इसे व्यापक और बेहतर विधेयक बताते हुए कहा कि निगमित क्षेत्र की स्वतंत्रता, पारदर्शिता और त्वरित न्याय की आवश्यकता को देखते हुए इसकी काफी जरूरत थी।
उन्होंने कहा कि एकल व्यक्ति वाली कंपनी की अवधारणा एकदम नई अवधारणा है लेकिन देखना यह है कि इसका उपयोग मौद्रिक शोधन, धन लेकर पलायन कर जाने जैसे अनुचित कार्यो के लिए न हो। उद्योग संगठन सीआईआई ने नए कानून के क्रियान्वयन में सरकार को हरसंभव मदद देने का भरोसा दिया है Source -Webdunia www.MLMguru.in  

Written by Editor in Chief

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