Network Marketing News -नेटवर्क मार्केटिंग कंपनियों पर बड़ता शिकंजा

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अमेरिका की एमवे कॉरपोरेशन की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक इकाई एमवे इंडिया ने करीब दो दशक पहले भारत में कदम रखा था और थोड़े ही समय में देश की सबसे बड़ी डायरेक्ट सेलिंग एफएमसीजी कंपनी बन गई। हालांकि आज एमवे इंडिया सारदा जैसी कंपनियों की कतार में खड़ी दिख रही है, जो निवेशकों को चूना लगाकर गैरकानूनी तरीके से धन संग्रह करती हैं। एमवे इंडिया के चेयरमैन एवं मुख्य कार्याधिकारी विलियम एस पिंकनी को हाल में अनैतिक तरीके से धन के लेनदेन के आरोप में आंध्र प्रदेश पुलिस ने गिरफ्तार किया था। करीब एक साल पहले इसी प्रकार के आरोपों में केरल पुलिस ने पिंकनी को गिरफ्तार किया था।

सारदा और एमवे इंडिया में मुख्य तौर पर चेन या रेफरल मार्केटिंग के सिद्धांतों को लेकर समानता है। हालांकि इनके बीच बुनियादी अंतर यह है कि मनी-पूलिंग कंपनियां लोगों को उनके निवेश पर ऊंचे रिटर्न का झांसा दिखाकर अपने नेटवर्क का विस्तार करती हैं, जबकि डायरेक्ट सेलिंग कंपनियां बिक्री पर अधिक कमीशन देने का वायदा करती हैं। इसलिए मनी-पूलिंग कंपनियों के उलट डायरेक्ट सेलिंग कंपनियों के पास वास्तविक उत्पाद मौजूद होते हैं। मनी-पूलिंग कंपनियां नए एजेंटों को जोडऩे के लिए अपने मौजूदा एजेंटों को कमीशन का भुगतान करती हैं, जबकि डायरेक्ट सेलिंग कंपनियां उत्पादों की बिक्री के लिए कमीशन देती हैं।

डायरेक्ट सेलिंग में व्यक्ति मुख्य तौर पर दो तरीके से मुनाफा दर्ज कर सकता- पहला, गैर-एजेंट के रूप में। इसके तहत खरीदारी और बिक्री लागत में अंतर के आधार पर मुनाफा हासिल किया जाता है। दूसरा, कंपनी के पंजीकृत एजेंट के रूप में। इसके तहत कुल बिक्री पर कमीशन दिया जाता है। कमीशन का दायरा 6 से 21 फीसदी के बीच होता है जो बिक्री मूल्य और समूह में एजेंट की स्थिति के आधार पर निर्धारित होता है। इसके विपरीत मनी-पूलिंग कंपनियां अपने एजेंटों को 35 से 40 फीसदी कमीशन की पेशकश करती हैं।

मान लीजिए कि डायरेक्ट सेलिंग कंपनियों के एजेंट मॉडल के तहत कोई व्यक्ति ‘ए’ डायरेक्ट सेलिंग कंपनी के किसी एजेंट से 100 रुपये में कोई वस्तु खरीदता है। इस पर उसे 3 फीसदी का नकद बोनस प्राप्त होता है। इसके बाद ‘ए’ नौ अन्य व्यक्तियों को उस वस्तु के बारे में बताता है और सभी नए खरीदार 100 रुपये कीमत वाले उस उत्पाद को खरीद लेता है। सभी नए खरीदारों को 3-3 फीसदी नकद बोनस प्राप्त होता है। हालांकि नौ अन्य ग्राहकों को जोडऩे में ‘ए’ की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही, इसलिए उसे कुल बिक्री पर अधिक कमीशन यानी 12 फीसदी रकम दी गई, जो 108 रुपये के बराबर है।

विशिष्ट कारोबारी मॉडल होने के बावजूद डायरेक्ट सेलिंग कारोबार को भारत में कई बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है। यहां फसाद की जड़ है प्राइज चिट्ïस ऐंड मनी सर्कुलेशन स्कीम (बैनिंग) ऐक्ट, 1978। इसके तहत राज्यों को इसे लागू करने के लिए खुद के नियम कायदे तैयार करने का अधिकार दिया गया है। इस कानून की धारा 2(सी) के तहत धन प्रवाह को परिभाषित करते हुए कहा गया है, ‘कोई भी योजना चाहे उसे कोई भी नाम दिया गया हो, जिसके तहत तुरंत या आसानी से रकम जुटाने के लिए या किसी भी रकम के लिए प्राप्तियों या रकम भुगतान के वायदे के साथ कोई भी मूल्यवान चीज जिसके लिए किसी योजना के तहत सदस्य के रूप में पंजीकृत किया जाए, चाहे इस प्रकार की रकम या वस्तु सदस्यों की प्रवेश रकम से आवर्ती खरीदारी के तहत हासिल हो।’

भारत में डायरेक्ट सेलिंग कंपनियां दो विशेष मुहावरों से खुद को अलग रखने की कोशिश करती हैं-‘तुरंत या आसान धन’ और ‘सदस्यों का पंजीकरण।’ ऐसी कंपनियां आमतौर पर नए एजेंटों को जोडऩे के लिए प्रोत्साहन के भुगतान से इनकार करती हैं और इसलिए उनके अनुसार इसमें तुरंत या आसान रकम का सवाल ही पैदा नहीं होता है। जबकि बिक्री बढऩे के साथ ही मुनाफे में हिस्सेदारी एजेंटों को भी दी जाती है। इंडियन डायरेक्ट सेलिंग एसोसिएशन की महासचिव छवि हेमंत ने कहा, ‘डायरेक्ट सेलिंग के लिए कोई विशेष कानून न होना ही सबसे बड़ी समस्या है। इसके अलावा प्रतिबंध संबंधी कानूनों को भी सही तरीके से परिभाषित किए जाने चाहिए।’ निषेधात्मक कानूनों से आमतौर पर अधिकारियों को काफी अधिक शक्तियां मिल जाती हैं।

उदाहरण के लिए, साल 2013 में जब पिंकनी और एमवे इंडिया के दो अन्य निदेशकों को केरल में गिरफ्तार किया गया था और उनकी गिरफ्तारी एक महिला विशालाक्षी अम्मा की शिकायत के आधार पर हुई थी। अम्मा ने अपनी शिकायत में दावा किया था कि एमवे ने उत्पादों के लिए 3.5 लाख रुपये जुटाए। उन्होंने यह भी कहा था कि वह कोई नया सदस्य नहीं बना सकी और अपनी रकम लौटाने के लिए कहने पर एजेंट ने इनकार कर दिया। इससे पहले केरल के वायनाड जिले के मेपड्डी में एमवे के खिलाफ इसी तरह के तीन मामले दर्ज किए गए थे। विशेषज्ञों का कहना है कि एमवे के परिचालन का दायरा काफी बड़ा है और आक्रामक मार्केटिंग रणनीति के कारण वह आसानी से अधिकारियों की नजरों में आ जाती है। स्त्रोत हिन्दी business-standard.com १५/०६/२०१४ MLM Law LOGO

Written by Editor in Chief

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